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राजनीति

NICE रोड परियोजना: कुमारस्वामी का आरोप, फैसले से कर्नाटक को 3 लाख करोड़ रुपये का नुकसान

एचडी कुमारस्वामी ने NICE रोड परियोजना की एलाइनमेंट और भूमि उपयोग में बदलाव को लेकर डीके शिवकुमार पर आरोप लगाए। शिवकुमार ने आरोपों को खारिज किया।

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HD Kumaraswamy at Bengaluru press conference

बेंगलुरु | 29 सितंबर 2026

NICE रोड परियोजना को लेकर केंद्रीय मंत्री और जेडी(एस) नेता एचडी कुमारस्वामी ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कुमारस्वामी ने कहा कि परियोजना की रूपरेखा में किए गए एक फैसले से राज्य को करीब 3 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

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NICE रोड परियोजना में बदलाव पर क्या आरोप लगाए गए?

कुमारस्वामी ने कहा कि 1997 के फ्रेमवर्क एग्रीमेंट के बाद मंजूर परियोजना की मूल योजना से हटकर बदलाव किए गए। उनके अनुसार, 2004 में जब शिवकुमार शहरी विकास मंत्री और बेंगलुरु-मैसूरु इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर प्लानिंग अथॉरिटी के अध्यक्ष थे, तब परियोजना की एलाइनमेंट और भूमि उपयोग में परिवर्तन हुआ।

उन्होंने आरोप लगाया कि टोल रोड के लिए तय जमीन का दायरा बढ़ाया गया और इंटरचेंज क्षेत्रों में जमीन के विकास तथा बिक्री का रास्ता खोला गया। कुमारस्वामी ने कहा कि इन बदलावों से निजी पक्षों को लाभ हुआ और राज्य के राजस्व को भारी नुकसान पहुंचा।

कुमारस्वामी ने मुख्यमंत्री से इस मामले में कार्रवाई की मांग की। उन्होंने परियोजना से जुड़े दस्तावेज और भूमि रिकॉर्ड पेश करने का भी उल्लेख किया।

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शिवकुमार ने क्या जवाब दिया?

शिवकुमार ने आरोपों को खारिज करते हुए कुमारस्वामी को संबंधित एजेंसियों के समक्ष शिकायत करने की चुनौती दी। उन्होंने कहा कि उनकी संपत्तियों और आय की जांच पहले भी चुनाव आयोग, आयकर विभाग तथा प्रवर्तन निदेशालय जैसी एजेंसियां कर चुकी हैं।

NICE परियोजना बेंगलुरु और मैसूरु के बीच प्रस्तावित बुनियादी ढांचा कॉरिडोर से जुड़ी पुरानी योजना है। भूमि आवंटन, एलाइनमेंट और डेवलपमेंट अधिकारों को लेकर यह परियोजना लंबे समय से कर्नाटक की राजनीति में विवाद का विषय रही है।

विवाद का राजनीतिक संदर्भ

कर्नाटक में यह विवाद ऐसे समय फिर उभरा है जब सरकार और विपक्ष बेंगलुरु की विकास योजनाओं, जमीन के इस्तेमाल और बड़े ढांचागत प्रोजेक्टों पर आमने-सामने हैं। कुमारस्वामी के आरोपों के बाद NICE रोड परियोजना को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।

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राजनीति

धनराज नाथवानी कौन हैं, जिनको लेकर सपा के राज्यसभा उम्मीदवार पर बहस छिड़ी है

धनराज परिमल नाथवानी कारोबारी और खेल प्रशासक हैं, जिन्हें समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवार बनाया है।

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Dhanraj Nathwani Rajya Sabha nomination

लखनऊ | 30 सितंबर 2026

धनराज परिमल नाथवानी समाजवादी पार्टी के उस ‘सरप्राइज’ उम्मीदवार हैं, जिनके नाम ने उत्तर प्रदेश की राज्यसभा राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े वरिष्ठ कॉरपोरेट अधिकारी और खेल प्रशासक नाथवानी ने 30 सितंबर 2026 को लखनऊ में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में नामांकन दाखिल किया।

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धनराज नाथवानी को लेकर बहस क्यों छिड़ी है

समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए प्रोफेसर रामगोपाल यादव के साथ धनराज परिमल नाथवानी को अपना उम्मीदवार बनाया है। नाथवानी ने 30 सितंबर 2026 को लखनऊ में पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में नामांकन दाखिल किया। उनका नाम सामने आने के बाद सपा के चयन और उनके कारोबारी संबंधों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हुई है।

कौन हैं धनराज परिमल नाथवानी

धनराज परिमल नाथवानी गुजरात से जुड़े कारोबारी और खेल प्रशासक हैं। वे रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े वरिष्ठ कॉरपोरेट अधिकारी के तौर पर काम करते हैं। सार्वजनिक परिचय में उन्हें रिलायंस न्यू एनर्जी लिमिटेड के निदेशक और समूह स्तर की जिम्मेदारियों से जुड़े व्यक्ति के रूप में बताया गया है।

परिवार और कारोबारी पृष्ठभूमि

नाथवानी का संबंध राज्यसभा सदस्य और उद्योगपति परिमल नाथवानी के परिवार से है। राज्यसभा के आधिकारिक दस्तावेज में परिमल नाथवानी के बेटे के रूप में धनराज नाथवानी का उल्लेख मिलता है। परिमल नाथवानी लंबे समय से कॉरपोरेट क्षेत्र से जुड़े रहे हैं और राज्यसभा में भी रह चुके हैं।

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खेल प्रशासन में भूमिका

कारोबार के अलावा धनराज नाथवानी का नाम खेल प्रशासन से भी जुड़ा रहा है। वे गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके हैं और गुजरात स्टेट फुटबॉल एसोसिएशन से भी जुड़े रहे हैं। इसी वजह से उनका सार्वजनिक परिचय केवल कॉरपोरेट क्षेत्र तक सीमित नहीं है।

राज्यसभा चुनाव का गणित

सपा ने नाथवानी को ऐसे समय उम्मीदवार बनाया है जब उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनावी प्रक्रिया चल रही है। निर्वाचन कार्यक्रम के अनुसार मतदान 16 अक्टूबर 2026 को होना है। पार्टी ने उनके साथ रामगोपाल यादव को भी उम्मीदवार बनाया है।

सपा के फैसले का राजनीतिक असर

नाथवानी का सपा से पारंपरिक संगठनात्मक जुड़ाव नहीं रहा है। इसी कारण उनके नाम को पार्टी के भीतर और विपक्षी दलों के बीच अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है। सपा नेतृत्व ने उन्हें उम्मीदवार बनाकर कारोबारी, खेल और सार्वजनिक जीवन के अनुभव वाले चेहरे को उच्च सदन की राजनीति में लाने का फैसला किया है।

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चुनाव

नंदीग्राम उपचुनाव: ममता गुट की प्रत्याशी ने नामांकन वापस लिया, ममता बनर्जी का कांग्रेस को समर्थन

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nandigram by election

कोलकाता | 18 सितंबर 2026

पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव से पहले राजनीति ने नया मोड़ ले लिया है। ममता बनर्जी के गुट की प्रत्याशी संचिता प्रधान डे ने अपना नामांकन वापस ले लिया। इसके बाद ममता गुट ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने की घोषणा की है।

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संचिता प्रधान डे की मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद नामांकन वापसी हुई। हालांकि संचिता ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं बताया कि उन्होंने चुनावी मुकाबले से हटने का फैसला क्यों लिया।

ममता गुट ने 13 सितंबर को संचिता को नंदीग्राम और रबीउल आलम चौधरी को रेजीनगर सीट से उम्मीदवार बनाया था। रेजीनगर में रबीउल आलम चौधरी मैदान में बने रहेंगे। दोनों सीटों पर मतदान 6 अक्टूबर को और मतगणना 9 अक्टूबर को होगी।

नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस को समर्थन क्यों अहम है

नंदीग्राम केवल एक विधानसभा सीट नहीं, बंगाल की राजनीति का प्रतीक रहा है। 2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने ममता बनर्जी को राज्य की राजनीति के केंद्र में पहुंचाया था। अब उसी सीट पर ममता गुट का पीछे हटना और कांग्रेस के पक्ष में खड़ा होना चुनावी गणित से अधिक राजनीतिक संदेश है।

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कांग्रेस को समर्थन देकर ममता गुट भाजपा विरोधी मतों के बिखराव को रोकने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इस फैसले से यह सवाल भी उठेगा कि क्या ममता गुट अपने संगठनात्मक दम पर चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं था, या फिर यह विपक्षी एकजुटता की सोची-समझी रणनीति है। इसका जवाब नतीजे देंगे।

दोनों टीएमसी गुटों को नए नाम और चुनाव चिह्न

चुनाव आयोग ने टीएमसी के दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को अंतरिम रूप से अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए हैं। ममता बनर्जी के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ का चुनाव चिह्न मिला है।

दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न दिया गया है। आयोग ने फिलहाल दोनों गुटों को ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और मूल ‘फूल-घास’ चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया है। मूल नाम और प्रतीक पर अंतिम निर्णय अभी होना बाकी है।

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नंदीग्राम की लड़ाई का पुराना राजनीतिक संदर्भ

2021 में ममता बनर्जी नंदीग्राम से शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ चुनाव हार गई थीं। 2026 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम और भवानीपुर, दोनों सीटों से जीत दर्ज की थी। उन्होंने भवानीपुर सीट रखी और नंदीग्राम से इस्तीफा दिया, जिसके बाद यहां उपचुनाव की जरूरत पड़ी।

अब नंदीग्राम उपचुनाव में मुकाबला केवल उम्मीदवारों का नहीं है। यह भाजपा के राजनीतिक प्रभुत्व, ममता गुट की रणनीति, कांग्रेस की स्वीकार्यता और विपक्षी वोटों की दिशा—चारों की परीक्षा बनेगा।

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